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कड़ी मेहनत के बाद भी अंधेरे में रह जाते हैं कुम्हार…लागत भी नहीं निकाल पा रहे

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25 अक्टूबर, सोनीपत -रोशनी का त्योहार दीपावली सबके लिए खुशियां लेकर आता है। हर जगह रोशनी ही रोशनी दिखाई देती है, लेकिन समाज में एक ऐसा भी वर्ग है, जो इस त्योहार की तैयारियों में दो माह पहले से ही जुट जाता है। फिर भी उनका जीवन अंधेरे में रहता है। ऐसे में सभी को उनके जीवन को रोशन करने की जरूरत है। दीपावली पर चाइनीज लडिय़ों का मोह छोडक़र परंपरागत दीप से अपने घर को सजाकर उनके घर को भी रोशन करें। पर्यावरण की दृष्टि से भी ये दीयेे काफी अनुकूल हैं।
चाइनीज लडिय़ों का मोह छोडक़र परंपरागत दीप से अपने  घर को करें रोशन
कुम्हार जो दो माह पहले से दीप बनाने के लिए लग जाते है। लेकिन ये फिर भी अंधरे में ही रहते हे ,इस वर्ग के लोगो ने  बताया कि पहले दीप बनाने में काफी कम खर्च आता है। लोगों में भी मिट्टी के दीप के प्रति बहुत लगाव था। लेकिन धीरे-धीरे दीप बनाने का खर्च महंगा हो गया और लोगों का लगाव कम हो गया। एक बुग्गी मिट्टी 1000 रुपये की खरीदनी पड़ती है। इसके अलावा ईधन का खर्च भी महंगा हो गया है। हर साल वह 30 से 40 हजार रुपये की लागत लगाकर दीप बनाते है। लेकिन उनकी लागत वसूलना भी मुश्किल हो जाता है। ओमप्रकाश के परिजन भी उनके साथ दीप बनाने का काम करते हैं ।वह मानते हैं कि कुम्हार की आने वाली पीढ़ी अब यह काम करने से गुरेज करने लगी है। इसमें अब घर का गुजारा करना भी मुश्किल हो गया है।वहीं दीप के खत्म हो जाने से चाइनीज माल और अधिक हावी हो जाएगा। मिट्टी के दीए बनाने वाले राज सिंह का कहना है कि आने वाले पीढीया अब मिट्टी के बनाया नहीं सिख रही है।
बहराल इस साल देखना ये होगा कि के लंबे इंतजार के बाद दीपावली धूमधाम से मनाई जा रही है,इस बार खुशी दिखाई दे रही है। इस बार कुम्हार कितना खुश होते हैं यह दीपावली के बाद ही स्पष्ट हो जाएगा ,लेकिन कुम्हार देशवासियों से यही अपील कर रहे हैं कि विदेशी छोड़कर स्वदेशी अपनाएं। वही कुम्हार वर्ग भी सरकार से अपील कर रहा है कि सरकार उनके बारे में भी सोचे सबसे पहले बनाने के लिए जगह का और मिट्टी का समाधान निकाल जाए। क्योंकि ऐसे में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोग समाप्ति की तरफ जा रहे हे।

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