चंडीगढ़। अरावली क्षेत्र में 100 मीटर तक खुदाई की अनुमति देने के केंद्र सरकार के फैसले को लेकर हरियाणा विधानसभा में सियासत गरमा गई है। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस निर्णय पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे पर्यावरण के लिए घातक करार दिया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सदन में सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख बताने की मांग की।
हुड्डा ने कहा कि अरावली क्षेत्र में इतनी गहराई तक खुदाई की अनुमति देना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ेगा और इसके दूरगामी दुष्परिणाम हरियाणा ही नहीं, बल्कि दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक महसूस किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार सदन में गैर-जरूरी विषयों पर चर्चा कर रही है, जबकि अरावली लाखों लोगों के जीवन की आधारशिला है, जिसे बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
कांग्रेस नेता ने कहा कि अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो उत्तर भारत के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती है। इसके कटाव से मरुस्थलीकरण तेजी से बढ़ेगा, भूजल रिचार्ज रुक जाएगा और जल संकट गंभीर हो जाएगा। साथ ही बाढ़ की घटनाएं बढ़ेंगी, वन्यजीवों का नुकसान होगा और प्रदूषण में इजाफा होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि खनन की अनुमति से अवैध खनन और माफिया राज को भी बढ़ावा मिलेगा।
इधर, हरियाणा युवक कांग्रेस ने भी इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष निशित कटारिया के नेतृत्व में मंगलवार से ‘अरावली बचाओ आंदोलन’ की शुरुआत की जाएगी। इस आंदोलन को ‘अरावली सत्याग्रह सद्भावना संकल्प अनशन’ नाम दिया गया है, जो गुरुग्राम में महावीर चौक गोशाला के सामने आयोजित होगा।
निशित कटारिया ने कहा कि अरावली पर्वतमाला पर्यावरण संतुलन, भूजल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को पहाड़ी की श्रेणी से बाहर करने के फैसले के बाद अरावली पर संकट और गहरा गया है।
वहीं, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने भी भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन अरावली और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार पूरी तरह मौन रही। उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नई परिभाषा स्वीकार किए जाने के बाद अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है, जो बेहद चिंताजनक है।







