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गांव की महिलाओं ने आर्टिफिशियल फ्लावर बनाकर रचा सफलता का इतिहास

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कुरुक्षेत्र | हरियाणा के गांवों की महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं। कुरुक्षेत्र के सुरा गांव की कुछ महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह के जरिए आर्टिफिशियल फ्लावर बनाने का स्टार्टअप शुरू किया, जो अब लाखों रुपये का कारोबार बन चुका है। इन महिलाओं ने न सिर्फ अपने हुनर से पहचान बनाई है, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए रोजगार का रास्ता भी खोला है।

छोटे स्तर से शुरू हुआ बड़ा सपना

संजू नाम की महिला ने 10 अन्य महिलाओं के साथ मिलकर मार्च 2020 में स्वयं सहायता समूह बनाया और घर पर ही आर्टिफिशियल फ्लावर बनाने का काम शुरू किया। पहले यह काम छोटे स्तर पर था, लेकिन अब ग्रुप का सालाना टर्नओवर करीब 15 लाख रुपये तक पहुंच गया है।

संजू बताती हैं कि उन्होंने शुरुआत में सिर्फ 5 हजार रुपये का निवेश किया था। उनके द्वारा बनाए गए रंग-बिरंगे फूल लोगों को इतने पसंद आए कि अब पूरे क्षेत्र में इनकी मांग बढ़ गई है।

हरियाणा सरकार से मिली बड़ी मदद

महिलाओं ने अपना समूह हरियाणा सरकार से रजिस्टर्ड करवाया हुआ है। इसके चलते उन्हें राज्य में आयोजित होने वाले मेलों जैसे गीता जयंती, फरीदाबाद सूर्यकुंड मेला और कपाल मोचन मेला में मुफ्त स्टॉल लगाने का मौका मिलता है। इन मेलों में उनके बनाए फ्लावर खूब बिकते हैं।

₹25 से ₹1500 तक के फ्लावर की डिमांड

संजू के समूह द्वारा बनाए गए फ्लावर ₹25 से ₹1500 तक के दामों में बिकते हैं। यह पूरी तरह हैंडमेड होते हैं और सजावट के लिए घरों, ऑफिसों और आयोजनों में इस्तेमाल किए जाते हैं। मांग के आधार पर यह महिलाएं कस्टमाइज्ड डिजाइन भी तैयार करती हैं।

स्थानीय स्तर पर तैयार होता है कच्चा माल

ज्यादातर कच्चा माल गांव में ही तैयार किया जाता है, जबकि कुछ सामग्री दिल्ली से खरीदी जाती है। महिलाएं विभिन्न हिस्सों को जोड़कर सुंदर फूल बनाती हैं, जो उनके कढ़ाई-सिलाई के अनुभव का शानदार उदाहरण हैं।

10 महिलाओं को मिला रोजगार, 1000 रुपये तक रोजाना कमाई

इस समूह से जुड़ी महिला रेखा बताती हैं कि वह घर के कामों के बाद खाली समय में फ्लावर बनाती हैं, जिससे रोजाना 500 से 1000 रुपये की कमाई हो जाती है। इस तरह महिलाएं महीने में 10 से 15 हजार रुपये तक कमा लेती हैं।

यह पहल न केवल महिलाओं की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनी है, बल्कि इसने साबित किया है कि अगर अवसर और सहयोग मिले, तो ग्रामीण महिलाएं भी आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ी छलांग लगा सकती हैं।

 

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