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अमेरिका में करनाल के प्रदीप की गोली लगने से मौत — रिटायर्ड फौजी ने की फायरिंग, खुद को भी मारी गोली

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Karnal, 19 October-:करनाल जिले के हथलाना गांव का बेटा प्रदीप (35) अमेरिका में दर्दनाक हादसे का शिकार हो गया। जानकारी के अनुसार, अमेरिका के पोर्टलैंड-वाशिंगटन बॉर्डर के पास एक रिटायर्ड फौजी ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें प्रदीप की मौके पर ही मौत हो गई। बताया जा रहा है कि हमलावर ने कुछ ही देर बाद खुद को भी गोली मार ली।

15 मिनट पहले पहुंचा था स्टोर, फिर गूंजे गोलियों के धमाके

चश्मदीदों के मुताबिक आरोपी फौजी करीब 15 मिनट पहले स्टोर में दाखिल हुआ था। कुछ देर बाद उसने अचानक प्रदीप पर 3-4 गोलियां दाग दीं। प्रदीप वहीं गिर पड़ा और आरोपी ने अपनी कनपटी पर पिस्तौल रखकर आत्महत्या कर ली। फायरिंग की वजह का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। पुलिस जांच में जुटी है।

डेढ़ साल पहले गया था अमेरिका, आठ महीने लगे सफर में

परिवार के अनुसार, प्रदीप डेढ़ साल पहले अमेरिका गया था, और उसे वहां तक पहुंचने में लगभग आठ महीने लग गए थे। हाल ही में उसने फोन कर बताया था कि उसे अच्छा काम मिल गया है और अब वह कर्ज चुकाने वाला है। लेकिन यह बात ही उसकी आखिरी कॉल बन गई।

आठ बहनों का इकलौता भाई, पिता पहले ही गुजर चुके

प्रदीप अपने परिवार का एकमात्र सहारा था। पिता पहले ही नहीं रहे, घर में मां, पत्नी और आठ बहनें हैं। प्रदीप की शादी को दस साल हो चुके थे, लेकिन कोई संतान नहीं थी। हादसे की खबर जैसे ही गांव पहुंची, पूरा हथलाना शोक में डूब गया।

दीवाली की तैयारी कर रहे थे, अब रोशनी बुझ गई”

गांववालों के अनुसार, सुबह करीब साढ़े नौ बजे जैसे ही फोन आया, प्रदीप के घर में कोहराम मच गया।
“वो हमेशा मुस्कुराता था, जिसे देखता ‘राम-राम’ करता था… अब उसी की खबर ताबूत में आ रही है।”
दीवाली से पहले गांव में सन्नाटा और मातम पसरा हुआ है।

परिवार की अपील — सरकार शव भारत लाने में मदद करे

परिवार पहले से ही कर्ज के बोझ में दबा है। उनका कहना है कि सरकार प्रदीप का शव जल्द भारत लाने में मदद करे ताकि अंतिम संस्कार गांव में हो सके। ग्रामीणों का कहना है, “वो परिवार का एकमात्र सहारा था, अब सबकुछ खत्म हो गया।

सवाल अब भी वही — सपनों की कीमत इतनी भारी क्यों?

प्रदीप की यह कहानी सिर्फ हथलाना गांव की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय परिवार की है जो अपने बेटे को बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश भेजता है। अब सवाल यह नहीं कि फौजी ने फायर क्यों की — बल्कि यह भी है कि कब तक प्रवासी भारतीय सपनों की कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे।

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