करनाल, 14 सितम्बर –हरियाणा में 2.70 लाख सरकारी कर्मचारी हैं। इसके अलावा डेढ़ लाख के करीब पेंशनर्स हैं। ऐसे में कर्मचारियों के परिवार को भी जोड़ा जाए तो इनकी संख्या करीब 15 लाख बनती है। कर्मचारी बड़ा वर्ग होने के चलते कोई दल इनको नाराज नहीं करना चाहता, बल्कि इनके वोट बैंक पर दलों की पूरी तरह से नजर है.लोकसभा चुनाव के बाद अब हरियाणा के विधानसभा चुनाव में भी ओपीएस (ओल्ड पेंशन स्कीम) अहम मुद्दा रहेगा। ओपीएस चुनावी समीकरण बनाने और बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। केंद्र सरकार की ओर से पेंशन को लेकर नई योजना यूपीएस (यूनाइटेड पेंशन स्कीम) लाने के बाद यह मामला और गरमा गया है। सरकार जहां यूपीएस के लाभ गिना रही है, वहीं कर्मचारी संगठनों के साथ-साथ विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हो गए हैं।
कर्मचारियों ने इसे सिरे से नकारते हुए कहा है कि उन्हें केवल और केवल ओपीएस चाहिए, कोई नई स्कीम लागू नहीं होने देंगे। वहीं विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए रणनीति तय कर ली है।भाजपा लोकसभा चुनाव में कर्मचारियों का झटका झेल चुकी है और कर्मचारियों की नाराजगी के चलते उनको पांच सीटें गंवानी पड़ी हैं। इस बार भाजपा पूरी तरह से कर्मचारियों पर नजर गढ़ाए हुए है। कैशलेस मेडिकल सुविधा देने के साथ कर्मचारियों का डीए भी बढ़ा दिया गया है। हालांकि, ओपीएस के मुद्दे पर भाजपा सरकार ने चुप्पी साध रखी है। केंद्र सरकार का मामला बताकर राज्य के नेता इस मुद्दे पर बोलने से बचते रहे हैं।
कांग्रेस खुलकर कर्मचारियों के समर्थन में
वहीं, कांग्रेस खुलकर कर्मचारियों के समर्थन में आ गई है। कांग्रेस के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने वादा किया है कि सरकार बनते ही पहली कलम से ओपीएस को बहाल किया जाएगा। इससे पहले हिमाचल में भी इसी मुद्दे पर कांग्रेस की सरकार बनी थी और हिमाचल सरकार ने ओपीएस को बहाल भी कर दिया है। इसलिए कर्मचारी हरियाणा में भी ओपीएस की बहाली के लिए आंदोलन कर रहे हैं।न्यू पेंशन स्कीम में संशोधन के लिए हरियाणा सरकार ने 20 फरवरी को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी की कर्मचारियों के साथ बैठक तो हुई, लेकिन आगे कुछ नहीं हुआ। कर्मचारियों से सरकार ने इस स्कीम के बारे में डेटा मांगा था, लेकिन कई बार समय मांगने पर भी दोबारा बैठक नहीं हुई। इसके बाद से कर्मचारी आंदोलन की राह पर हैं। कर्मचारी दिल्ली और पंचकूला में 3 बड़ी रैलियां करके सरकार को चेता चुके हैं।कर्मचारी नेताओं का तर्क है कि ओल्ड और न्यू पेंशन स्कीम में दिन और रात का अंतर है। न्यू पेंशन स्कीम के तहत कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर 1700 रुपये तक की पेंशन मिल रही है, जबकि ओपीएस की बात करें तो 10 गुना अधिक हो जाती है।
‘”एनपीएस ना यूपीएस, सिर्फ ओपीएस”
राज्य प्रधान, पेंशन बहाली संघर्ष समिति विजेंद्र धारीवाल ने बताया कि हरियाणा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कर्मचारियों को गुमराह करने के लिए केंद्र सरकार यूपीएस लेकर आई है, लेकिन कर्मचारियों को ओपीएस के अलावा कुछ भी मान्य नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री नायक सिंह सैनी हरियाणा के कर्मचारियों को धमकाने का काम कर रहे हैं। नायब सिंह सैनी ने कहा है कि उनकी सरकार बनने के बाद हरियाणा के कर्मचारी की चूड़ी टाइट करने का काम करेंगे। इस पर अध्यक्ष धालीवाल ने कहा कि ऐसे व्यान आचार संहिता का उल्लंघन करते है। उन्होंने चुनाव आयोग से भी शिकायत करने की बात कही की चुनावो के दौरान इस प्रकार की बयान बाजी करना आचार संहिता का उल्लंघन है। धालीवाल ने कहा अगर मुख्यमंत्री पुरानी पेंशन बहाली कर देते तो चुनाव में उनका कर्मचारियों का पूरा सहयोग मिलता इस तरह से बार-बार क्षेत्र बदलकर चुनाव ना लड़ना पड़ता। कर्मचारियों का आंदोलन जारी है। जब तक ओपीएस बहाल नहीं होगी, कर्मचारी वर्ग चैन से नहीं बैठेगा। जहां तक विधानसभा चुनाव की बात है तो कर्मचारी वर्ग हर उस पार्टी का विरोध करेगा जो ओपीएस के खिलाफ होगा। उन्होंने कहा अभी हम राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो का इंतजार कर रहे हैं उसके बाद अगली रणनीति बनाई जाएगी।







