अम्बाला : चन्द्रिका ( TSN)-महाशिवरात्रि पर्व पर
कांग्रेस वरिष्ठ नेत्री चित्रा सरवारा ने अम्बाला छावनी के प्राचीनतम हाथी खाना कैलाश मंदिर में शीश नवाकर भाेलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना की। चित्रा ने कहा कि अम्बाला छावनी की भूमि में अनेक धार्मिक स्थल हैं जहां पर लोगों की गहरी आस्था है। यहां देवी-देवताओं के प्राचीन मंदिर स्थित हैं। इन्ही प्राचीन मंदिरों में छावनी के हाथी खाना कैलाश मंदिर की अपनी अलग पहचान है। रोजाना धार्मिक संगीत के उच्चारण से मंदिर के आसपास का माहौल भक्तिमय हो जाता है। भक्तों की भारी भीड़ मंदिर में रोजाना देखने को मिलती है, लेकिन कोई भी पर्व होने पर यह भीड़ मेले में तबदील हो जाती है।
चित्रा ने कहा की मंदिर का निर्माण 1844 में उस समय हुआ जब यहां मुगलों का शासन था। उस समय मंदिर के स्थान पर फौज के हाथी बांधे जाते थे। उस समय यहां साधु-संतों का डेरा भी होता था। संतों की इच्छा के बाद यहां पर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर के संस्थापक श्री श्री 1008 महंत श्री जय राम दास जी महाराज लायलपुर वाले थे। उनके बाद उनके शिष्य श्री श्री 108 महंत श्री राम सेवक दास जी महात्यागी, श्री श्री 108 महंत श्री केशो दास जी महाराज, श्री श्री 108 महंत श्री काशी दास जी महाराज ने मंदिर का कार्यभार संभाला। वर्तमान में श्री श्री 108 महंत श्री मनमोहन दास जी महाराज गद्दीनशीन हैं। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में 40 फुट ऊंची अर्द्ध नारीश्वर की मूर्ति मुख्य आकर्षण का केंद्र है। इसके इलावा मंदिर में प्राचीन शिव मंदिर स्थापित हैं। मंदिर के परिसर में माता शीतला, संतोषी माता, राधा-कृष्ण, गणेश, गौरी-शंकर, हनुमान, सरस्वती, मारकंडेय सहित अन्य देवी-देवताओं का स्थान स्थापित किया गया है। यहां पर अखंड ज्योति प्रज्वलित होती है, जो हमेशा जली रहती है। उन्होंने कहा की हाथी खाना कैलाश मंदिर के प्रति लोगों की अपार श्रद्धा है।
अम्बाला से ही नहीं बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग दर्शन के लिए आते हैं। शिवरात्रि और सावन के महीने में यहां पर भक्तों का मेला लगता है। इस दौरान कई किलोमीटर तक भक्तों की लंबी कतारे लगी रहती है। ऐसी मान्यता है कि सावन के40 दिन जो भक्त नंगे पांव मंदिर में आकर भगवान शिव को जल चढ़ाता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।







