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अंबाला रेलवे स्टेशन पर पहुंचे MP रतनलाल कटारिया, विभाजन का दर्द झेल चुके लोगों को किया सम्मानित

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अंबाला: अंबाला रेलवे स्टेशन पर विभाजन विभीषिका दिवस पर एक चित्र प्रदर्शनी लगाईं जिसमें मुख्य अथिति के रूप में अंबाला से सांसद रतन लाल कटारिया पहुंचे। अंबाला रेल मंडल के डीआरएम सहित सभी रेल अधिकारी मौजूद रहे। इस मौके पर विभाजन का दर्द झेल चुके कुछ लोगों को भी बुलाया व उन्हें सम्मानित भी किया। विभाजन का दर्द झेल चुके लोगों ने मीडिया के सामने अपना विभाजन का दर्द भी बताया। साथ ही बताया कि वे आज अम्बाला पहुंचकर कितने खुश हुए हैं। कटारिया ने कहा कि आज प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक मुंबई से गुवाहाटी तक विभाजन की विभीषिका दिवस मनाया जा रहा है।

प्रभावित लोगों की पीड़ा और बलिदान की याद में भारतीय रेलवे देश के 773 जिलों में से एक या दो जिलों को कवर करते हुए 700 रेलवे स्टेशनों पर प्रदर्शनी का प्रदर्शन कर रहा है। इस संबंध में अंबाला मंडल ने अंबाला मंडल के 16 रेलवे स्टेशनों पर चित्र प्रदर्शनी लगाने का निर्णय लिया है। इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अंबाला के सांसद रतन लाल कटारिया ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। कटारिया ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानियों और पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत में बसने वाले भारतीयों की पीड़ा को महसूस करते हुए उन्हें सम्मानित किया गया।

कटारिया ने कहा कि आज प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक मुंबई से गुवाहाटी तक विभाजन की विभीषिका कार्यक्रम मनाया जा रहा है। आज सभी विभागों के लोग इस दिवस को मना रहे हैं। वहीं पर भारतीय रेलवे ने भी 700 स्थानों से भी ऊपर जगहों पर इस कार्यक्रम को मनाने जा रहा है। इसी के अंतर्गत ही यह कार्यक्रम हो रहा है। विभाजन विभीषिका का दर्द 8 करोड़ से भी ज्यादा लोगों ने झेला। मिल्खा सिंह का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मिल्खा सिंह के माता-पिता और परिवार को भी पाकिस्तान के अंदर ही मार दिया गया था। विभाजन की विभीषिका के परिणाम स्वरूप मिल्खा सिंह हिंदुस्तान में आए और दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर उन्होंने शुरू शुरू में सफाई का काम किया। बाद में वह खेल क्षेत्र में आए तो उन्होंने कई नए नए कीर्तिमान स्थापित किए तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने उन्हें फ्लाइंग सिंह की संज्ञा दी थी। विभाजन के बाद जो लोग यहां पर आए उन्होंने छोटे-छोटे काम किए और उन्हें शुरू-शुरू में काफी परेशानियां आई और आज वह आत्मनिर्भर है।

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