कुरुक्षेत्र, 28 मार्च- पितरों का तीर्थ पिहोवा में चैत्र चौदस मेले पर पंजाब, हिमाचल, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, जमू कश्मीर, चंडीगढ़ सहित देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पहुंच रहे है।लेकिन सबसे ज्यादा संख्या पंजाब से आने वाले सिख श्रद्धालुओं की रहती है.यहाँ पर डुबकी लगाने से दूर हो जाते है. कुरुक्षेत्र के पिहोवा को पृथुदक तीर्थ के नाम से विश्व भर में जाना जाता है, जिसे हिन्दू और सिख एकता के प्रतीक के नाम से एक अलग पहचान भी मिली हुई है और जिस समय चैत्र चौदस का मेला आता है, उस समय देश के विभिन्न हिस्सों से लाखो श्रद्धालु आते है । श्रद्धालु पावन सरस्वती तीर्थ में स्नान, पूजा व पिंडदान कर अपने पितरों की अक्षय मोक्ष की कामना कर रहे है ।
चैत्र चौदस पिंडदान का यहाँ पर है विशेष महत्व
मान्यता है कि यहां पर जो भी श्रद्धालु अपने पितरों का पिंडदान व उनको जल अर्पण करते है तो उनके पितर प्रसन्न होकर परिवार में सुख समृद्धि की वर्षा करते हैं। श्रद्धालु पिंडदान के बाद प्रेत पीपल पर जल भी चढा रहे है । बता दें कि कुरुक्षेत्र के पिहोवा में 27 मार्च से सरस्वती तीर्थ पर लगने वाले 3 दिवसीय चैत्र चौदस मेला चलेगा। 27 मार्च से शुरू होने वाले इस मेले में ज्यादा श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए पिंडदान, गति कर्म व तर्पण करने के लिए आ रहे है ।
तीर्थ पुरोहित एवं इतिहासकार विनोद पचौली ने बताया की तीर्थ पुरोहितों की भूमिका विशेष है। पुरोहित अपने यजमानों की वंशावली को पीढ़ी दर पीढ़ी बही-खातों में संजोकर रखते हैं। देश-विदेश से लोग अपने पितरों के लिए पूजा करने आते हैं, तो पुरोहित उनके पूर्वजों की वंशावली की जानकारी देते हैं। इस सेवा के बदले में यजमान दान-दक्षिणा अर्पित करते हैं। यह दक्षिणा 1 रुपए से लेकर लाखों रुपए तक हो सकती है। हालांकि पुरोहित अपने यजमान से कोई मांग नहीं करते।अलग-अलग नाम से गद्दीइस तीर्थ पर पुरोहितों को गद्दी के नाम से जाना जाता है। इन गद्दी का नाम लेते हुए यजमान अपने पुरोहित तक पहुंचते हैं। यहां बड़ वाले, डफां वाले, फुलकारी वाले, सालग्राम गद्दी, बंसरी वाले, छतरी वाले व राजपुरोहित (धौली हवेली) प्रमुख गद्दिया है। इसके अलावा यजमान अपने पुरोहितों को हरी पगड़ी वाले, नंबरदार जी, घड़ी वाले, पचौली और अन्य नाम से भी पुकारते हैं।
तीर्थ पर 200 से ज्यादा पुरोहित अपनी-अपनी गद्दी पर विराजमान
तीर्थ पर 200 से ज्यादा पुरोहित अपनी-अपनी गद्दी पर विराजमान हैं। कई श्रद्धालु, जो सालों बाद या पहली बार यहां आते हैं, उनके लिए अपनी वंशावली देखना एक भावनात्मक अनुभव होता है। बड़े व्यापारी, राजपरिवार, राजनैतिक और बॉलीवुड हस्तियों की वंशावली भी यहां दर्ज है। ये अपने पुरोहित को दान स्वरूप बड़ी धनराशि भी अर्पित करते हैं।मेले में सरस्वती तीर्थ पर स्नान और प्रेत-पीपल पर जल अर्पित करने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। यह माना जाता है कि यहां पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। श्रद्धालु विधिपूर्वक कर्मकांड संपन्न कर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। हर रोज तीर्थ पर हजारों श्रद्धालु स्नान, दान और पूजा करने के लिए आते हैं।







