सिरसा 5 मार्च –अक्सर देखने में आता है ब्लैक बोर्ड को साफ करने से उत्पन्न डस्ट से हाथों में इन्फेक्शन और चॉक की धूल से श्वास रोगों में भी बढ़ोतरी होती है। साथ ही कक्षाओं में कहीं भी डस्टर की धूल झाडऩे से कक्षा की सुंदरता भी बिगड़ती है। चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर हरीश रोहिल व उनकी टीम ने आटो मैटिक चाक डस्टर क्लीनिंग डिवाइस बनाकर इन सभी समस्याओं से निजात दिलाई है। उस डिवाइस के प्रयोग से जहां इन्फेक्शन भी नहीं होगा और ब्लैक बोर्ड भी साफ होगा।
डस्टर साफ होने वाली चाक की धूल में कैल्शियम भरपूर मात्रा में होता है और अगर एक सीमित मात्रा तक इसे पौधों में डाला जाए तो यह खाद का काम करती है। इसलिए चॉक की धूल पेड़-पौधों के लिए जीवनदायिनी भी बनेगी। 6 फरवरी 2025 को इसका पेटेंट भी हो चुका है। विश्वविद्यालय ने पेटेंट के बाद इसके मॉडल को मार्केट वाइबल प्रोडक्ट बनाने के लिए इस प्रोजेक्ट को 2 लाख 70 हजार रुपये का अनुदान भी दिया है, ताकि अलग अलग स्कूलों में इसके माडल तैयार करके इसके टेस्ट किए जाएंगे।
क्यों पड़ी डिवाइस बनाने की जरूरत
प्रोफेसर हरीश रोहिल ने बताया कि दो साल पहले उसके हाथ की अंगुलियों में इन्फेक्शन हो गया। जब चिकित्सक से सलाह ली तो पता चला कि चाक की धूल से एलर्जी हुई। इसके पश्वात उसके मन में एक मशीन बनाने का आइडिया आया, ताकि धूल किसी के कपड़े पर ना गिरे। क्योंकि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में अधिकतर ब्लैक बोर्ड पर चाक का प्रयोग होता है। इसे साफ करने के लिए केवल डस्टर या कपड़ा ही एकमात्र चीज है। बोर्ड को साफ करने के बाद चाक मिट्टी को निकालने के लिए उसे दीवार या बेंच पर ही झटकाया जाता है। इस दौरान खुद भी व्यक्ति चाक की धूल से नहीं बच सकता। इसके बाद आटोमैटिक चाक डस्टर क्लीनिंग मशीन बनाने की सोची। पहले हमने प्री माडल के तौर पर लड़की का बाक्स लिया। इसमें मोटर के अतिरिक्त एक सेल, एडाप्टर और सेंसर का प्रयोग किया गया। डस्टर को डिब्बे में रखने पर हल्का सा प्रेस करने पर मशीन आन हो जाएगी। मशीन चालू होने के बाद यंत्र मिट्टी को खींच लेगा और इसे बॉक्स में इक्क्ठा करेगा। जब डस्टर को उठाया जाएगा तो मशीन बंद हो जाएगी। प्रोफेसर हरीश ने बताया कि अब नया माडल कांच और प्लास्टिक मिश्रित अकरेलिक शीट से तैयार किया जाएगा। यह डिवाइस एसी और डीसी में होगी। एक बार बैटरी रिचार्ज करने पर 15 दिन तक चल सकती है।
एक महीने का लगा समय
वोल 2 इस मशीन को तैयार करने में टीम को करीब एक महीने का समय लगा।इसे बनाने में सीडीएलयू के डा. हरीश रोहिल के साथ डा. नरेंद्र कुमार, डा. मंजू रोहिल, नरेंद्र धामू, गाजियाबाद के प्रदीप कुमार पाठक, सरदूलगढ़ से राकेश कुमार, अमेठी यूनिवर्सिटी से डा. यशपाल सिंह, एमडीयू रोहतक से डा. गोपाल सिंह ने टीम वकज़् के तौर पर काम किया। इसके बाद 11 मार्च 2023 को टी ने इसे पेंटेंट करवाने के लिए मिनिस्ट्री आफ कामसज़् एंड इंडस्ट्री के कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट डिजाइन एंड ट्रेड माकज के पास आवेदन किया था। जिसके बाद 12 अप्रैल 2024 को कंट्रोलर जनरल आफ पेटेंट डिजाइन एंड ट्रेड माकज़् ने अपने जनज़्ल में इसे प्रकाशित किया। जिसके बाद डिवाइस की तकनीक को लेकर हियरिंग हुई और 6 फरवरी 2025 को प्रोफेसर हरीश रोहिल को इसका पेटेंट मिला।
पेटेंट कोरपोरेशन ट्रीटी के लिए किया जाएगा आवेदन
प्रोफेसर हरीश रोहिल ने बताया कि इस तकनीक को विदेशों में पेटेंट करवाने के लिए पीसीटी के पास आवेदन किया जाएगा। यदि यह आवेदन मंजूर हो जाता है तो एक निश्चित समय तक पीसीटी के अधीन आने वाले 158 देशों में हमारे पेटेंट को मान्यता मिल जाएगी और हम किसी भी देश में पेटेंट फाइल कर पाएंगे।







