पंचकूला: भारत में अनेक शहरों का अस्तितिव बेहद पुराना है, जिनमें से कुछ तो प्रसिद्ध काल से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं, इन्ही नगरों में से एक है हरियाणा। कहा जाता है कि युद्ध हरियाणा की पावन भूमि कुरुक्षेत्र में सम्पन हुआ था। जी हां, यही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अर्जुन को भगवद गीता के उपदेश दिए थे। आज हम आपको पंचकूला के मशहूर माता मनसा देवी मंदिर का इतिहास बताने जा रहे हैं, जो अपने आप में बेहद खास महत्व रखता है। इस मंदिर का इतिहास बड़ा ही प्रभावशाली है। माता मनसा देवी मंदिर में चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मेला लगता है। जिसके चलते यहां लाखों की तादाद में श्रध्दालु आते हैं। यहां लोग माता से अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए आशिर्वाद लेते हैं। जो कोई भी माता से मुराद मांगता है उसकी मुराद जरूर पूरी होती है।

मंदिर तक आती थी 3 किलोमीटर लंबी गुफा
माना जाता है कि जिस जगह पर आज मां मनसा देवी का मंदिर है, वहां पर सती माता के मस्तक का आगे का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर पहले मां सती के मंदिर के नाम से जाना जाता था। बताया जाता है कि मनीमाजरा के राजा गोपालदास ने अपने किले से मंदिर तक एक गुफा बनाई हुई थी, जो लगभग 3 किलोमीटर लंबी है। वे रोज इसी गुफा से मां सती के दर्शन के लिए अपनी रानी के साथ जाते थे। मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको कुल 786 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर सुबह के 5 बजे से रात के 9 बजे तक खुला रहता है। बस दोपहर में 12 बजे से 2 बजे के बीच मंदिर बंद किया जाता है। मान्यता है कि इस वक्त में मनसा देवी का श्रृंगार किया जाता है।

पौने 200 साल पहले बना था यह मंदिर
माता मनसा देवी का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि अन्य सिद्ध शक्तिपीठों का। माता मनसा देवी के सिद्ध शक्तिपीठ पर बने मदिंर का निर्माण मनीमाजरा के राजा गोपाल सिंह ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर आज से लगभग पौने 200 साल पहले चार साल में अपनी देखरेख में सन् 1815 में पूर्ण करवाया था। मूर्ति के आगे तीन पिंडियां हैं, जिन्हें मां का रूप ही माना जाता है। ये तीनों पिंडियां महालक्ष्मी, मनसा देवी तथा सरस्वती देवी के नाम से जानी जाती हैं। मंदिर की परिक्रमा पर गणेश, हनुमान, द्वारपाल, वैष्णवी देवी, भैरव की मूर्तियां एवं शिवलिंग स्थापित है।








