पानीपत। अक्टूबर की शुरुआत के साथ एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। बढ़ते एक्यूआई को देखते हुए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) के पहले चरण के तहत प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को तेज किया जा रहा है। नगर निगम ने सड़कों पर पानी के छिड़काव और एंटी-स्मॉग गन के इस्तेमाल की तैयारी शुरू कर दी है।
इस बार जिले में पराली जलाने की घटनाएं प्रदूषण की प्रमुख वजह के तौर पर सामने नहीं आई हैं। कृषि विभाग के अनुसार अब तक जिले में फसल अवशेष जलाने की एक भी घटना दर्ज नहीं हुई है। जिले में करीब 2.25 लाख एकड़ में धान की खेती हुई है और खेतों से निकलने वाले अवशेषों का मशीनों के माध्यम से प्रबंधन किया जा रहा है। बड़ी मात्रा में पराली का इस्तेमाल पशुचारे के लिए किया जा रहा है, जबकि टेक्सटाइल उद्योगों में भी इसका उपयोग हो रहा है।
शहर में बढ़ते एक्यूआई और प्रदूषण के स्तर को देखते हुए नगर निगम पानीपत ने ग्रैप-1 के तहत कार्रवाई तेज कर दी है। सोमवार को नगर निगम आयुक्त डॉ. पंकज राव की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में विभिन्न विभागों के अधिकारियों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए। आयुक्त ने अधिकारियों को सभी उपाय तत्काल लागू करने और फील्ड स्तर पर नियमित निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
नगर निगम आयुक्त ने स्पष्ट किया कि ग्रैप-1 के दौरान किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं होनी चाहिए। उन्होंने निर्माण स्थलों पर धूल को नियंत्रित करने के लिए ग्रीन नेट और ग्रीन मैटिंग लगाने के निर्देश भी दिए। साथ ही सड़कों पर धूल कम करने के लिए पानी के छिड़काव और जरूरत के अनुसार एंटी-स्मॉग गन चलाने की तैयारी की जा रही है।
प्रदूषण बढ़ने में सड़क की धूल के साथ औद्योगिक गतिविधियां भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। शहर की टेक्सटाइल और डाइंग इकाइयों में कोयले पर प्रतिबंध के बाद बायोमास और पराली से बनी ब्रिक्स जैसे वैकल्पिक ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ा है। दूसरे राज्यों से इन ईंधनों की आपूर्ति भी हो रही है। चिमनियों से निकलने वाले धुएं पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने की स्थिति में इसका असर वायु गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
इसके अलावा औद्योगिक वाहनों की आवाजाही और सड़कों पर जमा महीन धूल भी प्रदूषण बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं। अक्टूबर में हवा की गति कम होने पर प्रदूषक कण वातावरण में अधिक समय तक बने रह सकते हैं, जिससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार 0 से 50 एक्यूआई को अच्छा, 51 से 100 को संतोषजनक, 101 से 200 को मध्यम, 201 से 300 को खराब, 301 से 400 को बहुत खराब और 401 से 500 को गंभीर श्रेणी में रखा जाता है। एक्यूआई 200 से ऊपर पहुंचने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव का खतरा बढ़ जाता है, जबकि 300 से ऊपर की वायु गुणवत्ता लंबे समय तक स्वास्थ्य के लिए अधिक नुकसानदायक मानी जाती है।







