राकेश कुमार शर्मा, करनाल | मदर्स डे पर जहां एक ओर सोशल मीडिया मां के सम्मान और प्रेम से भरे संदेशों से सजा हुआ है, वहीं हरियाणा के करनाल स्थित निर्मल धाम वृद्ध आश्रम से सामने आई तस्वीरें समाज को भीतर तक झकझोर देने वाली हैं। यहां रहने वाली कई बुजुर्ग माताएं आज भी अपने बच्चों की सलामती की दुआ करती हैं, लेकिन उनकी आंखों में अपने बेटों और परिवार के लौटने का इंतजार साफ दिखाई देता है।
कभी अपने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाने वाली ये माताएं आज वृद्ध आश्रम के कमरों में अकेलेपन के साथ जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। किसी का बेटा विदेश में है, कोई बड़ा कारोबारी है तो किसी का पोता ऑस्ट्रेलिया में बस चुका है। बावजूद इसके, इन माताओं की जिंदगी अब परिवार से दूर आश्रम की चारदीवारी तक सीमित होकर रह गई है।निर्मल धाम वृद्ध आश्रम में करीब 55 बुजुर्ग महिलाएं रह रही हैं। इनमें कई ऐसी माताएं हैं, जिनके बच्चों ने जिंदगी में बड़ी कामयाबी हासिल की, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर मां-बाप का सहारा बनने की बजाय उन्हें अकेले छोड़ दिया।
वृद्धाश्रम में रह रहीं दया रानी ने भावुक होकर कहा, “अब यही आश्रम हमारा घर बन चुका है। यहां सेवा करने वाले लोग ही परिवार जैसे लगते हैं। बच्चे जब भी आते हैं, कुछ लेने ही आते हैं… देने नहीं।” हालांकि शिकायतों के बावजूद एक मां का दिल आज भी अपने बच्चों के लिए दुआ ही मांगता है। उन्होंने कहा, “भगवान मेरे बच्चों को खुश रखे, वे जहां भी रहें सुरक्षित रहें।”
आश्रम में रह रहीं आशा रानी का मानना है कि आज की पीढ़ी रिश्तों से दूर होती जा रही है। उन्होंने कहा, “बुजुर्गों को बोझ समझा जाने लगा है, जबकि संस्कारों की सबसे बड़ी सीख बुजुर्ग ही देते हैं। परिवारों में उनका होना बहुत जरूरी है।” सावित्री नाम की बुजुर्ग महिला ने अपने दर्द को शब्दों में बयां करते हुए कहा, “जब बेटा मुझे यहां छोड़कर गया था, तब वह भी रोया था और मैं भी…” उन्होंने बताया कि उनका पोता ऑस्ट्रेलिया में रहता है, लेकिन अब आश्रम में रहने वाली महिलाएं और यहां के सेवादार ही उनका परिवार बन चुके हैं।
पिछले पांच वर्षों से आश्रम में रह रहीं लाजो ने बताया कि घरेलू विवादों के बाद बच्चे उन्हें यहां छोड़ गए थे। उन्होंने कहा, “पहले फोन आ जाते थे, अब त्योहारों पर भी सिर्फ इंतजार ही रह जाता है।”वहीं आश्रम में बुजुर्ग महिलाओं की सेवा करने वाली चंचल ने कहा कि इन माताओं की सेवा करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। “इनकी सेवा करके ऐसा लगता है जैसे कई मांओं का आशीर्वाद मिल रहा हो। रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, अपनापन और सेवा से भी बनते हैं।”
मदर्स डे के मौके पर यह तस्वीर समाज को एक बड़ा संदेश देती है कि मां-बाप को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि अपनेपन और साथ की जरूरत होती है। जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उन्हें सबसे ज्यादा इंतजार अपने बच्चों की आवाज, उनके समय और उनके प्यार का होता है। आज भी इन माताओं की आंखों में अपने बच्चों के लिए वही प्यार, वही दुआएं और वही इंतजार मौजूद है… फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह इंतजार घर के आंगन में नहीं, बल्कि वृद्ध आश्रम के शांत कमरों में होता है।







