करनाल (अकुंर कपूर): हरियाणा के करनाल में स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने इको फ्रेंडली दिवाली की पहल की है। एनडीआरआई ने गाय के गोबर से प्रदूषण रहित मूर्तियां व दिए बनाए हैं। यह दिव्य मूर्तियां न केवल आसानी से नष्ट हो जाएंगे बल्कि इन्हें गमले या बगीचे में डालने से इनमे से अपने आप ही फलदार पौधे व सब्जियां अंकुरित होने लगेंगे। यह विचार जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान डॉ आशुतोष का है जिनका मानना है कि गाय के गोबर को शुद्ध माना जाता है। वह हम पूजा पाठ में अक्सर गाय के गोबर का इस्तेमाल करते हैं लेकिन अब इसी गोबर से दिए का मूर्तियां बनाई जाएंगी। साथ ही इन्हें जल में प्रवाह करने से जल दूषित नहीं होगा बल्कि उसमें जो वनस्पतियां हैं उन्हें खाद मिलेगा। इतना ही नहीं हिंदुओं को बनाते समय उन्होंने इसमें पौधों में सब्जियों के बीज भी डाले हैं, जिससे की इस्तेमाल के बाद अगर इन्हें गमलों या बगीचे में डाला जाता है तो इनसे फलदार पौधे है।

सब्जियों के बीज अंकुरित होंगे इससे पर्यावरण भी अच्छा होगा। उनका कहना है अगर एक परिवार 11 दीपक भी जलाता है तो प्रति दीपक बनाने पर 20 ग्राम मिट्टी लगती है। 11 करोड़ दीपक बनाने पर 22000 क्विंटल मिट्टी लगती है। एक क्विंटल मिट्टी को 900 डिग्री सेंटीग्रेड पर पकाने के लिए लकड़ी की ईंधन मात्रा 533 किलोग्राम लगती है। इसी प्रकार 2200 क्विंटल मिट्टी को पकाने के लिए पौने दो लाख केवल इधन की जरूरत पड़ती है। और 1 क्विंटल लकड़ी को जलाने पर 175 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होता है साथ में मिट्टी से बने दिए हजारों वर्ष मिट्टी में नष्ट नहीं होते लेकिन गोबर के लिए बनाने पर ना तो इंजन की जरूरत पड़ेगी और यह भी है साथ के साथ मिट्टी में नष्ट भी हो जाएंगे जिससे पर्यावरण बचा रहेगा। इससे ग्रामीण आंचल को रोजगार भी मिल सकता है।

ऐसा करने पर रोजगार को भी बढ़ावा होगा और किसान अपनी गायों के गोबर से दिए बना आए कमा सकेंगे। वहीं इन दिया का निर्माण कर रही रुचिका व इंद्रजीत कौर का कहना है कि वह पिछले 6 महीने से इन दिनों का निर्माण कर रही हैं इनकी शुरुआत एक दिए से हुई जिसका निर्माण इन्होंने हाथ से किया जब उसमें सफलता मिली तो और अधिक दीए बनाने की सोची। और अब तक यह हजारों दिए और मूर्तियां तैयार कर चुकी हैं जिन्हें एनडीआरआई के आउटलेट के अलावा दूसरे जिलों के लोग भी खरीद कर ले जा रहे हैं।

इनका कहना है कि यह एक उद्योग का जरिया भी हो सकता है लोग यहां से खरीद कर उनमें अपनी इच्छा अनुसार रंग भर कर बेच सकते हैं जिससे उन्हें अच्छी कमाई हो सकती है। साथ में वह बताती है कि इन मूर्तियों वादियों में फलों व सब्जियों के बीज डाले गए हैं जिससे की खंडित होने के बाद जब इन्हें गमलों में डाला जाए तो अलग-अलग तरह के पेड़ पौधे उग सके। पंजाब से आकांक्षा व मधु शर्मा एनडीआरआई घूमने आई तो उनकी नजर हिंदी ओवर मूर्तियों पर पड़ी जिन्हें देखकर वह है काफी प्रभावित हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि जब उन्होंने नजदीक आकर इंदीवर मूर्तियों को देखा तो वह काफी प्रभावित हुई और इनके बारे में पढ़ा तो पता चला कि यह इंवॉल्वमेंट के लिए फायदेमंद है और वह इन्हें जरूर खरीदना चाहेगी।








