हिसार। पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी सोनिया और संजीव को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से मिली नियमित जमानत के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ के समक्ष करीब दो घंटे तक चली सुनवाई में दोषियों की समय पूर्व रिहाई और जमानत को लेकर कई अहम सवाल उठाए गए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने सोनिया और संजीव की ओर से समय पूर्व रिहाई को संवैधानिक अधिकार बताए जाने पर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने सवाल किया कि आखिर किस आधार पर इसे संवैधानिक अधिकार माना जा रहा है। न्यायमूर्ति ने यह भी कहा कि समय पूर्व रिहाई कोई स्वत: मिलने वाला संवैधानिक अधिकार नहीं है।
खंडपीठ ने दया याचिका के संबंध में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि राष्ट्रपति के समक्ष लंबित दया याचिका पर निर्णय लेने के लिए संविधान के अनुच्छेद 72 में कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं है। केवल दया याचिका पर निर्णय में देरी होने के आधार पर किसी दोषी को समय पूर्व रिहाई या अन्य राहत का अधिकार नहीं मिल जाता।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने यहां तक टिप्पणी की कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत सजा के पहलू पर दोबारा विचार कर सकती है। उन्होंने पूर्व के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया।
खंडपीठ ने 1966 में नरेश श्रीधरन के मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले का संदर्भ दिया। इसके अलावा शत्रुघ्न चौहान मामले का भी उल्लेख हुआ, जिसमें दया याचिकाओं पर अत्यधिक देरी को आधार मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 13 दोषियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था।
दरअसल, सोनिया और संजीव ने अपने काउंटर एफिडेविट में एक स्थान पर दावा किया है कि सरकार की ओर से बनाई गई नीति के तहत समय पूर्व रिहाई उनका संवैधानिक अधिकार है। इसी दावे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाए और संबंधित कानूनी आधार स्पष्ट करने को कहा।
रेलूराम पूनिया के भतीजे जितेंद्र और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आइना खोवाल और अधिवक्ता लाल बहादुर खोवाल ने पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत सोनिया और संजीव को राहत मिली थी। सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई अभी जारी है और अगली सुनवाई की तारीख फिलहाल निर्धारित नहीं की गई है।
क्या है रेलूराम पूनिया हत्याकांड
अगस्त 2001 में हिसार के लितानी गांव स्थित फार्म हाउस में पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया, उनकी पत्नी कृष्णा देवी, बेटे सुनील, बहू शकुंतला, बेटी प्रियंका, पोते लोकेश और पोतियों शिवानी तथा 45 दिन की प्रीति की हत्या कर दी गई थी। इस सामूहिक हत्याकांड ने पूरे हरियाणा को झकझोर दिया था।
मई 2004 में हिसार की अदालत ने सोनिया और संजीव को हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी सजा बरकरार रखी थी। बाद में उनकी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 9 दिसंबर 2025 के फैसले में दोनों को अंतरिम जमानत दी थी। इसी फैसले के खिलाफ रेलूराम पूनिया के भतीजे जितेंद्र और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है। अब शीर्ष अदालत में इस याचिका पर सुनवाई चल रही है।







