अंकुर कपूर, अंबाला। दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इस पर्व पर रावण दहन की परंपरा का विशेष महत्व है। इसी परंपरा को अंबाला छावनी की 55 वर्षीय महिला केसर ने स्वरोजगार का माध्यम बना लिया है। वह अपने परिवार के साथ मिलकर रावण के पुतले तैयार कर रही हैं और उन्हें बाजार में बेचकर आमदनी जुटा रही हैं। राजस्थान में रावण के पुतले बनाकर बेचने की परंपरा से प्रेरित होकर उन्होंने अंबाला में यह काम शुरू किया। अब दशहरे से पहले बाजार में उनके बनाए पुतले लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
दशहरे का त्योहार नजदीक आते ही अंबाला छावनी के बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। लोग पूजा और त्योहार से जुड़ा सामान खरीदने के लिए बाजार पहुंच रहे हैं। इसी बीच सड़क किनारे बिक्री के लिए रखे रावण के अलग-अलग आकार के पुतले भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। इन पुतलों के पीछे किसी बड़ी फैक्ट्री का नहीं, बल्कि एक महिला और उसके परिवार की मेहनत का योगदान है।
केसर ने बताया कि उन्हें राजस्थान में रावण के पुतले बनाकर बेचने के काम को देखकर यह विचार आया। इसके बाद उन्होंने अंबाला में भी इस काम की शुरुआत की। अब परिवार के सदस्य मिलकर पुतले तैयार करते हैं और त्योहार के दौरान उन्हें बाजार में बेचते हैं। इस काम में काफी मेहनत लगती है और एक पुतला तैयार करने में करीब तीन दिन का समय लग जाता है।
पुतलों की कीमत उनके आकार के अनुसार तय की जाती है। छोटे आकार के रावण के पुतले करीब 500 रुपये में बेचे जा रहे हैं, जबकि बड़े पुतलों की कीमत लगभग एक हजार रुपये तक है। केसर के मुताबिक, उन्होंने पिछले साल भी रावण के पुतले बनाकर बेचे थे और लोगों ने उनके इस प्रयास को पसंद किया था। इसी अनुभव से उत्साहित होकर उन्होंने इस बार भी पुतले तैयार किए हैं। उन्हें उम्मीद है कि दशहरे तक उनके बनाए सभी पुतले बिक जाएंगे।
केसर की यह पहल दिखाती है कि पारंपरिक त्योहारों से जुड़े हुनर को रोजगार का साधन भी बनाया जा सकता है। परिवार के साथ मिलकर काम करने से जहां उन्हें आमदनी का अवसर मिल रहा है, वहीं स्थानीय बाजार में भी उनके उत्पादों को जगह मिल रही है। दशहरे पर रावण के पुतले बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देंगे, तो वहीं इन्हें बनाने वाली केसर की मेहनत स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही है।







